शुक्रवार, 11 मार्च 2016

दिल की बातें - 18

तुम जो अब कहते हो कि वक़्त कहाँ मिलता है
कभी ता क़यामत मेरा इन्तिज़ार किया करते थे

अब तो हो मेरी जान ओ पहचान से इन्कारी तुम
कभी हरेक ज़र्रे ही में मेरा दीदार किया करते थे

तेरी गली से भी गुज़रूँ तो है यूँ इख़्तिलाफ़ तुझे
मेरे घर तक को जो तुम बाज़ार किया करते थे

है नागवार जो तेरे ख़्वाबों का रुख़ करता हूँ मैं
इस दिल तक बाहक़ असफ़ार किया करते थे

मेरे सवाल जो तुम्हें फ़र्ज़ अब रूदाद दीवाने की
ज़रा सी बात औ' शिकवे हज़ार किया करते थे

किनारा कर लिया तुमने कि क्या कहेगी दुनियाँ 
तुम्हीं ज़माने में इश्क़ का यल्गार किया करते थे 

आज समझो मुझे बेशक जान तुम जानी दुश्मन
तुम्हीं तो हो जो मुझपे जाँनिसार किया करते थे

- प्रणव कान्त झा
११ मार्च, २०१६.









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