रहैत अछि सदिखन
सपनायल सन,
दिन हो वा राति
देखैत अछि सपना-
नेह सं बान्हल परिवार'क
सुख-शान्ति सं भरल घर'क
सिनेह सं जुड़ल द'र-दियाद'क
प्रेम आ विश्वास सं गछारल गाम'क।
अप्पन'क सुख लेल,
संसार छोड़बा'क सपना
त'
संसार'क सुख लेल,
अपनहुं कें त्याग'क सपना
देखैत अछि
ई आँखि।
ई आँखि
भरल उछाह सं
जौखन रहैत अछि-
हित-मीत, स'र-समाज'क बीच,
ई आँखि
सरल सिनेह सं
जौखन रहैत अछि-
क'र-कुटुम्ब, स'र-समांग'क संग।
ई आँखि
जरल अंगोर सं
जं देखल कतहु-
पाखंड, अनेति आ अन्याय,
ई आँखि
सजल नोर सं
जं होइछ कतहु-
बेबस, बेकल आ अनुपाय।
ई आँखि
संजोगैत अछि पियास
एकटा सपना पुरला बाद
नब-नब सपना देखबा लेल,
ई आँखि
संजोगैत अछि आस
एकटा सपना टुटला बाद
बेपरीत समय सं लड़बा लेल।
औ मीत!
जं बुझ' चाही हमरा
त'
नहि देखू हम्मर
घर-घरारी, कपड़ा-लत्ता, जुत्ता-छत्ता,
आइद-ओकाइद आ कि ज'र-जथा।
बरु देखू अहि
छोट आँखि'क पैघ-पैघ सपना,
ओकरा साँच करबा'क निस्सन ज़िद्द,
आँखि'क अंतिम जोइत तक
आ
पौरुख'क अंतिम साँस तक
आ कि
तकरा बादो चाहब ह'म
जे भटै ई आँखि
कोनो जोइतहीन सपनजीबी कें,
आ फेरि देखय
ई आँखि-
नब-नब सपना
आ
यैह थीक अंतिम साँच
जे देखय ई आँखि।
- प्रणव कान्त झा
१८ मई, २०१६.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें