कहती रहीं मेरी आँखें राज़ ए दिल लेकिन
मैं उसकी ज़िन्दगी में कोई पहला तो न था
कब कहता उसे कि इश्क़ ने मुझे भी छुआ
मेरी ज़िन्दगी में एक यही मसला तो न था
उसको दिल जीतने की बहुत लत थी लगी
मैं कोई खेल की बाज़ी का दहला तो न था
जो सबने देख लिया वो समझ ही ना पाया
ये अक्स ए तसव्वुर इतना धुँधला तो न था
चलो छोड़ो भी, टूटा जो दिल ग़रीब का था
घर मिट्टी का ये शेख़ का नौमहला तो न था
आप बहके उन आँसुओं से, आप ही जानो
वो दानिश थे, दिल उनका बहला तो न था
- प्रणव कान्त झा
२८ मई, २०१६.
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