ज़िन्दगी है नहीं आसान ये माना
मुश्किल भी कहाँ ठान लो ग़रचे
अजनबी कोई हो जाता है अपना
तुम भी उसे अपना मान लो ग़रचे
अन्जाना कोई इंसान कहाँ रहता
ज़रा कोशिश कर जान लो ग़रचे
ख़ुद से ख़ुद की जंग हार ही जाते
यों जीत के सारा जहान लो ग़रचे
सारी दुनियां लगती है ख़ुशगवार
घर में अमन ओ आमान हो ग़रचे
सफ़र के दरमियाँ होती है आसानी
साथ अपने थोड़ा सामान लो ग़रचे
- प्रणव कान्त झा
३० मई, २०१६.
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