कोई छूते ही जल जाए जो
इक आग सी क्यों मुझमें है
मेरा दर्द बाँट कर वो दर्द ले
इक चुभन जो क्यों मुझमें है
वो मेरे संग-संग मरता रहा
ऐसा ज़हर ये क्यों मुझमें है
जो भी था मेरा अब है कहाँ
पर ख़्वाहिशें क्यों मुझमें हैं
ना मैं पा सकूँ ना वो आ सके
फिर जलन सा क्यों मुझमें है
मुझे चाहती तू जो बोल क्यों
ज़रा बोल भी दे क्या मुझमें है
- प्रणव कान्त झा
२९ मई, २०१६.
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