इश्क़ का साग़र ख़ाली-ख़ाली मुझमें है
इक तन्हाई मुझमें भरा है वक़्त ने दोस्त
खुल कर हँसते खेलते हम भी तेरी तरह
पर मुझमें यह दर्द भरा है वक़्त ने दोस्त
दिल शीशे सा नाज़ुक साफ़ था मेरा भी
इस पर कैसा ग़र्द धरा है वक़्त ने दोस्त
जिस चेहरे पर रंगे मुहब्बत खिलता था
स्याह रंग सा पोत रखा है वक़्त ने दोस्त
कि जिन आँखों ने सपने चाँद के देखे थे
वां अमावस कर रक्खा है वक़्त ने दोस्त
एक संवरता घर था प्यारा शहर में वो
कैसे तो बर्बाद किया है वक़्त ने दोस्त
आती थी महफ़िल में जिससे जान कभी
उसको तन्हा सफ़र दिया है वक़्त ने दोस्त
- प्रणव कान्त झा
३० मई, २०१६.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें