बुधवार, 6 जनवरी 2016

दिल की बातें - 11

बीता साल, गुज़रा वक़्त हँसते कुछ रोते
टूटे कई बार मगर रहे माबूद इरादे मेरे

दिखता हो जो आपको हूँ मैं दरअस्ल यही
ज़ाहिर हैं हमेशा कहाँ पोशीदा इरादे मेरे

हारा कई महाज़ जंग जीतने की ख़ातिर 
मेरी जद्दोजहद से परीशां रहे प्यादे मेरे

ये बात और कि माक़ूल वक़्त नहीं आया
क़ायम हैं अपनी जगह जो थे वादे मेरे

रहूँ मैं भी ख़ुश-चैन रहे सारी दुनियाँ मेरी
यही थोड़े तो हैं सपने कहाँ ज़्यादे मेरे

- प्रणव कान्त झा
०६ जनवरी, २०१६

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