काश!
हम भी
समझ पाते
कि
बार-बार जो
आतंकी,
अमर्यादित
और
उग्र होते हो तुम,
वह तो
प्रतिफल है-
हमारी ही विवेकशून्यता का।
कोई तो
कसर नहीं छोड़ा हमने
कि
हमने भी ध्वस्त किए हैं
तुम्हारे-
हर नियम
हर विधान
हर विन्यास
और
तुम्हारी
हर मर्यादा।
तो
आज तुम
फिर एक बार,
हमलावर हुए-
गुरिल्लों से,
तहस-नहस कर गए
हज़ारों की मिहनत,
लाखों की रोटी
और
करोड़ों के सपने।
तो
आज तुम
फिर एक बार
सिखा गए हमें,
हमारा ही विज्ञान
कि
हर क्रिया के विपरीत
और
बराबर प्रतिक्रिया होती है।
हमें
प्रकृति पर
सत्ता चाहिए अपनी
सो हम चूकते नहीं
करने से घात
और
तुम समर्थ अतुलित
करते हो प्रतिघात
तो
आज जब
उजड़ी-
सद्य:प्रसूता
'खेतों की कोख'*
हत्या हुई-
मासूम
'हरे शैशव'* की
और
फूटकर बिलखी-
'धरती औ' उसकी संतानें'*
फिर साबित हुआ
कि
सारी सत्ता और सामर्थ्य की
लड़ाईयों में,
नुक़सान तो होता है
मासूमियत और इंसानियत का ही।
- प्रणव कान्त झा
१ अप्रैल, २०१६.
प्रेरणा: श्रीमान् Manoj Shandilya जी की कविता 'आह'
* 'आह' कविता के वाक्यांश
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