गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

मैथिली रचना - १३

ओहिना.... किछुओ.....

बरख'क बरख बीतल
मोन अछि नोरे तीतल
कि आहो रामा
सोन सन जे गाम छुटिए जायत रे की

की नेनपनि छल ओ
दिन बितय हंसि-खेलि
सबह'क आशीष समेटी
सबह'क सिनेह सम्हारी
कि आहो रामा
कोना बिधि से दिन घुरियो आओत रे की

भोरे उठि गबैत पराती
भरि दिन करमे बिताबै
बेरू'क पहर सभ मिलि
सुन्नर चौपाड़ि सजाबै
कि आहो रामा
ओहो सुदिनमा आब नहि आओत रे की

गाम'क सिमान पर
पिपरि'क गाछ त'र
गहबर पुजैत पुजैते
धिया सभ गीत गाबै
कि आहो रामा
बितैत समैय्या संग से मेटि जायत रे की

दुक्खो अबैत रहय
सभ संग कटैत छल
शुभ ओ सुदिन सेहो
हंसि-हंसि बंटैत छल
कि आहो रामा
ओ' नेह-छोह सभ बिसराओत रे की

मोन'क सौख-सिहन्ते
कत' सं कत' चलि आओल
खन-खन जिनगी पूछय
मोन की चैनो पाओल
कि आहो रामा
रन में भागैते दिबस कटि जायत रे की

- प्रणव कान्त झा
२० अप्रैल, २०१६.

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