वो नस्लें जो विरासत में मिल्लत ओ सुकूं ना दें
उन नस्लों की रिवायतों पर सवाल लाज़िमी हो
जिन मक़तबों में तालिब बस मशीन बन रहे हैं
उन उस्ताद ओ मक़तबों पर सवाल लाज़िमी हो
ग़र मज़हबों के क़ायदे ही जीना अज़ाब कर दें
उस तसव्वुर ए मज़हबां पर सवाल लाज़िमी हो
उस नाम ही के सदके ग़र इंसानियत हो ज़ख़्मी
फिर क्यों ना उस वजूद पर सवाल लाज़िमी हो
- प्रणव कान्त झा
३ अप्रैल, २०१६.
प्रेरणा - श्रीमान् Dhruv Gupt जी की एक फ़ेसबुक पोस्ट
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