हे नारी,
आज जब
हर जगह तुम्हारी
स्तुतियाँ
गायीं जा रही होंगी
और
पुरुषसत्तात्मक समाज के बंधनों
से नारी मुक्ति के
संकल्प लिए जा रहे होंगे,
मैं
अपने अनजान
एकांत में बैठा
भयभीत हूँ तुमसे।
मेरे
भय को
अन्यथा मत लेना तुम
किसी मनुवादी की सोच
की तरह।
मैं
बिलकुल नहीं
चाहता कि
तुम निरीह रहो
सीता, अहिल्या और तारा की तरह
सतीत्व के उदाहरणार्थ।
अथवा,
छली जाओ तुम
मंदोदरी, गांधारी और दमयंती के जैसी
पतिव्रत के
प्रतिमान गढ़ने हेतु।
मैं तो
यह भी नहीं चाहता
कि
तुम भोग्या बनो
रम्भा, मेनका और उर्वशी की तरह
देवों के सुखार्थ।
अथवा,
अपहृता होओ
अम्बा, अंबिका और अंबालिका के जैसी
किसी दम्भी के
पुरुषार्थ प्रमाण हेतु।
मैं
ज़रा भी
भयभीत नहीं
कि
पुरुषों के निर्धारित
सारी सीमाओं को तोड़
पुनः
प्रतिष्ठित हो रही तुम
घोषा, लोपामुद्रा, मैत्रेयी, गार्गी
और
भारती की तरह।
ना,
मुझे तनिक भी भय नहीं
कि
आज फिर तुम
स्वयंवरा हो रही हो,
अपने शिव और सत्यवानों की
सती और सावित्री की तरह
या कि
हरण कर रही हो,
अपने कृष्ण और अर्जुनों का
रुक्मिणी और सुभद्रा की तरह
वा कि
उपभोग कर रही हो,
अपने इच्छित प्रियों का
कुंती, माद्री और द्रौपदी की तरह।
मैं
भयभीत हूँ
कि
पुरुषों से होड़ करती तुम भी
उन्हीं के जैसी
अहंकारी, अराजक और अमानवीय
हो गयीं
तो
अंतर क्या होगा
तुम्हारे और उनके बीच?
मैं
भयभीत हूँ
कि
आख़िर,
ताड़का, पूतना हो कि सूर्पनखा,
थीं तो वह भी स्त्रियाँ ही।
- प्रणव कान्त झा
08 मार्च, 2014.
आज जब
हर जगह तुम्हारी
स्तुतियाँ
गायीं जा रही होंगी
और
पुरुषसत्तात्मक समाज के बंधनों
से नारी मुक्ति के
संकल्प लिए जा रहे होंगे,
मैं
अपने अनजान
एकांत में बैठा
भयभीत हूँ तुमसे।
मेरे
भय को
अन्यथा मत लेना तुम
किसी मनुवादी की सोच
की तरह।
मैं
बिलकुल नहीं
चाहता कि
तुम निरीह रहो
सीता, अहिल्या और तारा की तरह
सतीत्व के उदाहरणार्थ।
अथवा,
छली जाओ तुम
मंदोदरी, गांधारी और दमयंती के जैसी
पतिव्रत के
प्रतिमान गढ़ने हेतु।
मैं तो
यह भी नहीं चाहता
कि
तुम भोग्या बनो
रम्भा, मेनका और उर्वशी की तरह
देवों के सुखार्थ।
अथवा,
अपहृता होओ
अम्बा, अंबिका और अंबालिका के जैसी
किसी दम्भी के
पुरुषार्थ प्रमाण हेतु।
मैं
ज़रा भी
भयभीत नहीं
कि
पुरुषों के निर्धारित
सारी सीमाओं को तोड़
पुनः
प्रतिष्ठित हो रही तुम
घोषा, लोपामुद्रा, मैत्रेयी, गार्गी
और
भारती की तरह।
ना,
मुझे तनिक भी भय नहीं
कि
आज फिर तुम
स्वयंवरा हो रही हो,
अपने शिव और सत्यवानों की
सती और सावित्री की तरह
या कि
हरण कर रही हो,
अपने कृष्ण और अर्जुनों का
रुक्मिणी और सुभद्रा की तरह
वा कि
उपभोग कर रही हो,
अपने इच्छित प्रियों का
कुंती, माद्री और द्रौपदी की तरह।
मैं
भयभीत हूँ
कि
पुरुषों से होड़ करती तुम भी
उन्हीं के जैसी
अहंकारी, अराजक और अमानवीय
हो गयीं
तो
अंतर क्या होगा
तुम्हारे और उनके बीच?
मैं
भयभीत हूँ
कि
आख़िर,
ताड़का, पूतना हो कि सूर्पनखा,
थीं तो वह भी स्त्रियाँ ही।
- प्रणव कान्त झा
08 मार्च, 2014.
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