मेरे सभी अपनों को, शुभेच्छुओं को, साथ ही उनको भी जिनको कि मेरा दर्द भी ख़ुशी देता हो, ये नया साल 2014 मुबारक़ हो. प्रकृति आपको आपकी ज़िन्दगी के इस साल की किताब के 365 सफ़्हों में से हर सफ़्हे पर आपकी कामयाबी की नई इबारत लिखने का मौक़ा दे. आपके कामयाबी की हर कहानी आपके अपनों की ख़ुशी और उनके होठों की हँसी का वायस हो. मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ हरचंद आपके साथ हैं.
आपका, प्रणव।
दर्द बेशुमार दिए हमको गुज़रे हुए वक़्त ने माना
ख़ुशी हरचंद नहीं मिलती, ये भी है इक सवाल चलें।
चंद मग़रूर जो नासूर बन गए थे रिश्ता-ए-दिल के
छोड़ उनको ग़ुरूर पे उनके, अज़ीज़-ए-दिल करें निहाल चलें।
भूल जो भी हुई है अब तक इरादतन-ग़ैरइरादतन चाहे
भूल को भूलकर करते हैं, नया कुछ इस साल चलें।
सपनों पर जो पड़ गया था गर्द-ए-वक़्त अब तक शायद
पोंछ कर हर लम्हात को हम, कायम करें मिसाल चलें।
राह में रुक गए थे ठिठक कर जो कल तक पल-छिन
शुरू करते हैं नया इक सफ़र, चलो अबके साल चलें।
ग़ैर-ज़रूरी जो भी हों उन बातों को ज़रा टाल के परे
छोड़ो पुरानी चाल कि अब आया है नया साल चलें।
- प्रणव कान्त झा
01 जनवरी, 2014.
आपका, प्रणव।
दर्द बेशुमार दिए हमको गुज़रे हुए वक़्त ने माना
ख़ुशी हरचंद नहीं मिलती, ये भी है इक सवाल चलें।
चंद मग़रूर जो नासूर बन गए थे रिश्ता-ए-दिल के
छोड़ उनको ग़ुरूर पे उनके, अज़ीज़-ए-दिल करें निहाल चलें।
भूल जो भी हुई है अब तक इरादतन-ग़ैरइरादतन चाहे
भूल को भूलकर करते हैं, नया कुछ इस साल चलें।
सपनों पर जो पड़ गया था गर्द-ए-वक़्त अब तक शायद
पोंछ कर हर लम्हात को हम, कायम करें मिसाल चलें।
राह में रुक गए थे ठिठक कर जो कल तक पल-छिन
शुरू करते हैं नया इक सफ़र, चलो अबके साल चलें।
ग़ैर-ज़रूरी जो भी हों उन बातों को ज़रा टाल के परे
छोड़ो पुरानी चाल कि अब आया है नया साल चलें।
- प्रणव कान्त झा
01 जनवरी, 2014.
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