गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

दिल की बातें - 4

जिस रह चला हूँ, जो सफ़र चुना है मैंने,
दुश्वारियाँ तो हैं , फिर भी एक सपना है।

कोई मंज़िल नहीं आसां, मेरी भी होगी कैसे,
ख्वाब मुश्किल सही, हक़ीक़त में इन्हें ढलना है।

वक़्त की राख़ ने छुपा रक्खे हैं इम्तिहां के शोले,
हर सिम्त चराग़ाँ हो, अभी और मुझे जलना है।

चंद अपने भी हैं राह में, तेग़-ओ-ख़ंजर लेकर,
जख्मी रूह लिए, सब्र-ओ-ज़ब्त से पर चलना है।

ये मिट्टी, ये हवा-पानी, सब दुश्मन हैं तो क्या,
पौध-ए-ख्वाहिशात को हर हाल में पनपना है।

पुकारता हूँ तुम्हें, दर्द-ए-दिल की गलियों से आओ,
वसीला-ए-मंज़िल की तेज़ धूप में जो तपना है।

जिस रह चला हूँ, जो सफ़र चुना है दिल ने,
दुश्वारियाँ तो हैं, फिर भी एक सपना है।

- प्रणव कान्त झा
15 जनवरी, 2014. 

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