शुक्रवार, 7 मार्च 2014

दिल की बातें - 5

पाँव बुज़ुर्गों के छुए जब भी हमने तो मिली,
मुसलसल दुआ उनकी कि लम्बी हो उमर। 

मिलती रही दुआएँ और हम जीते ही गए,
सोचा कहाँ कभी कि क्यों लम्बी हो उमर?

क़िरदार बड़ा, सोच बड़ी, हो कुछ तदबीर भी,
इसमें  क्या बड़ाई कि बस लम्बी हो उमर।

बेख़ुदी में रहे हम ताउम्र ख़ुदग़र्ज़ी में जिए,
जो दिल ही नहीं बड़ा, क्यों लम्बी हो उमर?

जीना कुछ इस तरह, बाद-ए-ज़िंद भी जियो,
छोटी भी गुज़ारो कि ख्वाह लम्बी हो उमर। 

- प्रणव कान्त झा 
26 जनवरी, 2014. 
   

  

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