मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

मैथिली रचना - ३७

प्रेम छह तों
*********

आत्ममुग्धता
अहं कें पांखि ल' 
ओ उड़ैत रहल सगरो
मोन में छिट्टा भरि घृणा भरने -
सबहक लेल।
आत्मबोधक संग
भरि-भरि बाकुट नेह
छिटैत रहलहुं हम सदिखन
हिय में आस'क अमार लेने - 
दिन फिरबाक।
साइत कोनो खन
बैसि गेल रहय अनचोके ओ
हम्मर सिनेहक जजाति बीच
त'
सोहरओने रही हम - आत्मा ओकर
नेहक संग
अंगेजि लेने रहय ओहो - सगर गात हमर
कोनो मात्सर्जें।
से 
जेना कामना'क 
चरम सं उपजल सुन्न में
लौकैत हो ब्रह्म खन भरिक लेल,
तहिना
ओक्कर घृणा सं किछु खन खलियायल सुन्न में 
जोगओलहुं जे नेह'क एक टुकड़ा इजोत;
ओही सं जनमल - निस्सन प्रेम छह तों।
से हे!
बरू अंगेजने रहिह' ओहि सुन्न कें सदति
भरि लिह' आत्मा कें
नेह, मात्सर्ज आ सांचक इजोत सं -
तों; हम्मर जिनगीक अंतिम आस।

- प्रणव नार्मदेय
१४ फ़रवरी, २०१७.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें