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ओना तं
सेनुर छिटकबैत भोर सं
झामर होइत अन्हरिया राति धरि
खपेने रहैत छथि ओ अपना कें
सबह'क खगता पूर करैत।
सौंसे घर-परिवार, पाबनि-तिहार, रीति-रेबाज
अंगेजने रहैत छथि ओ
जेना एकसर हुनके टेकने
बांचल रहि जायत -
कुलक मान आ मरजाद।
हुनके
सिनेह'क गढ़गर मांटि सं
नीपल-छछारल आँगन-घर'क
एकहक कोन में
मिज्झर भेल देखा पड़ती ओ
सदिखन।
बिखम सं बिखम परिस्थिति में
करैत छथि निमाह
एकहक सर-संबंध कें
बनबैत छथि जिबन्त
जेना
एकटा मूल स्वर करैत अछि पूर्ण
वर्णमालाक
एकहक स्वर आ व्यंजन कें।
मुदा
जखन बेर अबैछ
हुनक अस्तित्व'क पहिचान कें
त'
अनेरे अबडेरि देल जाइत रहली कात
जेना होथि ओ अयोगवाह।
आओर
आब अहि उमेरक अवसान में
सहजें बहटारल सेहो जा रहलथि
एनमेन विसर्ग जकां
ओ कुल-भाखा'क - मूल स्वर।
- प्रणव नार्मदेय
२० फ़रवरी, २०१७.
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