सोमवार, 9 जनवरी 2017

मैथिली रचना - ३५

ओहिना...किछुओ...

भेल मोन'क सभटा रंग जुदा
सभ छिड़ियायल संबंध मुदा
मानल जे समय छै बाम भेल
जिनगी'क अंत कहाँ होइ छै
कर्ता हिय तंग कहाँ होइ छै!

अप्पन अप्पन जिनगी सबहक
ओ स'र-समाजो'क हक़ जानल
परमार्थ कें ख़ातिर स्वार्थ तजै
किछुए में होइछ से सक मानल
तोड़य दुनियाँदारि'क प्रबंध
सभ में से ढंग कहाँ होइ छै!
कर्ता हिय तंग कहाँ होइ छै!

ककरो अछि लोभ अलेल धन'क
कियो मान'क मोह सं रहय भरल
कत्तहु मन में भरि छाक घृणा
कियो सदति नेह कें संग चलल
अछि सबह'क संग स्वार्थ किछुओ
ओहिना कियो संग कहाँ होइ छै!
कर्ता हिय तंग कहाँ होइ छै!

कियो बरू नीक-बेजाय बुझय
किछु लोक सत्त कें संग रहल
जतबा अंदर ओतबहि बाहिर
अभिनय ओ कोनो कहाँ कयल
मुँह देखि देखि मुंगबा बांटय
सभ के से भंग कहाँ होइ छै!
कर्ता हिय तंग कहाँ होइ छै!

धरती पर पयर कहाँ राखय
कनियो आगां जं लोक बढ़ल 
मानल एहने अछि लोक बेस
किछु त' एहनो हम लोक देखल
कतबो ओ ऊँच चढ़य सीढ़ी 
मुदा मोन मतंग कहाँ होइ छै!
कर्ता हिय तंग कहाँ होइ छै!

अन्हर, कारी दुख सन बदरी
आ झिहिर-झिहिर साओन बरसल
पीयर ढाबुस संग चास हरित
पनिसोखा'क सातों रंग सजल
अछि रंग-बिरंग'क ई दुनियाँ 
एक्कहि टा रंग कहाँ होइ छै!
कर्ता हिय तंग कहाँ होइ छै!

- प्रणव नार्मदेय 
०९ जनवरी, २०१७.

चित्र साभार: गूगल इमेजेज़

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